राजीव अभी निगम बोध घाट से घर लौटा अपनी माँ का दाह संस्कार कर के .. परेशान और बेबश ..उसे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था की आखिर उसके साथ हो क्या गया .. घर में सामान खोजता है फिर बुदबुदाता है पता नहीं मम्मी ने मेरा पर्स कहा रख दिया .. और अचानक रोने लगता है .. अब उसकी माँ नही रही उसकी जिन्दगी तो भई उसके माँ के इर्दगिर्द ही घूम रही थी ..
"माँ" ये शब्द शायद छोटा हो लेकिन काफी कुछ खुद में समेटे और संजोये हुये है ..
इन्सान हमेशा अपने दुःख को भूलना चाहता है आखिर ज़िन्दगी न रूकती है और न ही रुकेगी
लेकिन आज वो अकेला है एकदम अकेला न उससे कोई बात करने वाला बचा न उसकी मनोभावना को समझने वाला .. परिस्थितिया कुछ ऐसी बन गई थी शायद !!
"माँ" ये शब्द शायद छोटा हो लेकिन काफी कुछ खुद में समेटे और संजोये हुये है ..
इन्सान हमेशा अपने दुःख को भूलना चाहता है आखिर ज़िन्दगी न रूकती है और न ही रुकेगी
लेकिन आज वो अकेला है एकदम अकेला न उससे कोई बात करने वाला बचा न उसकी मनोभावना को समझने वाला .. परिस्थितिया कुछ ऐसी बन गई थी शायद !!
No comments:
Post a Comment